नगर पालिक निगम, दुर्ग के राजस्व वसूली का विश्लेषणात्मक अध्ययन
डाॅ एच.एस. भाटिया1, डाॅ एस.एन. झा2, अंकिता नामदेव3
1सहायक प्राध्यापक, शा. दिग्विजय महाविद्यालय, राजनांदगांव
2प्राध्यापक, शा. विश्वनाथ यादव तामस्कर महाविद्यालय, दुर्ग
3शोधार्थी, शा. विश्ेेवनाथ यादव तामस्कर महाविद्यालय, दुर्ग
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प्रत्येक संस्था को अपने आर्थिक क्रियाओं के संचालन व विस्तार के लिये वित्त की आवश्यकता होती है। स्थानीय संस्थाओं को भी अपने सभी कार्यों के निर्वहन व संचालन हेतु वित्त/धन की आवश्यकता पड़ती है। ये वित्त ही राजस्व/लोक वित्त कहलाते हैं। राजस्व के द्वारा ही स्थानीय संस्थायें अपने कार्यों का निर्वहन कर पाती है। स्थानीय निकाय अपने राजस्व की प्राप्ति करों से अकरगत स्त्रोतों से व राज्य सरकार द्वारा प्राप्त अनुदान से करती है। निगम प्रशासन अगर अपने करगत व अकरगत राजस्व की वसूली अधिक से अधिक करने लगे तो वह अपने नागरिकों को मूलभूत सुविधा आसानी से उपलब्ध करा सकेगा। इस शोध अध्ययन में नगर पालिक निगम, दुर्ग के राजस्व वसूली के अध्ययन हेतु प्राथमिक व द्वितीयक समंकों का संकलन किया गया है। शोध अध्ययन का मुख्य उद्देश्य निकाय की राजस्व वसूली को जानना है। अध्ययन में यह पाया गया कि, निकाय की राजस्व वसूली शत् प्रतिशत तो नहीं परन्तु संतोषप्रद कही जा सकती है। किसी वर्ष वसूली अच्छी है तो किसी वर्ष वसूली का आकड़ा बहुत ही कम है। नगर पालिक निगम, दुर्ग अगर सम्पत्तिकर सहित सम्पूर्ण राजस्व वसूली पर ध्यान दे तो निगम अपने राजस्व वसूली के द्वारा ही आत्म निर्भर बन अपने नगर का उत्तरोत्तर विकास कर सकेगा।
राजस्व, सम्पत्तिकर, राजस्व वसूली, वित्त, नगरीय प्रशासन।
भूमिका:
स्थानीय निकायों के संबंध में कहा जाता है कि ये पालने से लेकर श्मशान तक के कार्यों का निर्वहन करती है अर्थात् स्थानीय निकाय व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के कार्यों को करती है। मनुश्य नगर या गांव में जन्म लेता है। वहीं पलता है, बड़ा होता है, शिक्षा प्राप्त करता है और वृद्ध होकर उसकी मृत्यु हो जाती है। इस प्रकार जन्म लेने के पष्चात् बच्चों के लिये नर्सरी स्कूलों, प्राथमिक माध्यमिक शिक्षा युवाओं के लिये सांस्कृतिक गतिविधियां सबके लिये चिकित्सा, व्यापार, वाणिज्य, आवागमन, विद्युत, प्रकाश, स्वच्छता, जल की आवश्यकताओं की पूर्ति करना तथा मृत्यु होने पर श्मशान की व्यवस्था करना ये स्थानीय संस्थाओं के कार्य है। इस प्रकार संस्थाएं नागरिकों को मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराने हेतु कार्य करती है। स्थानीय निकायों के कार्यों को नगरीय निकायों की विद्यमान क्षमता एवं वित्तीय संसाधनों को देखते हुये दो भागों में बांटा गया है:-
(1) अनिवार्य कार्य (2) ऐच्छिक कार्य
अनिवार्य कार्य का प्रारूप सभी राज्यों में प्रायः समान ही है परन्तु ऐच्छिक कार्यों के संबंध में भी सभी संविधियों में एक सर्वव्यापी कार्य का उल्लेख होता है। ’’कोई अन्य कार्य जिसमें सार्वजनिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा तथा सामान्य कल्याण के परिवर्धन की सम्भावना हो।’’1(माहेश्वरी श्रीराम, भारत में स्थानीय शासन, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, आगरा पृष्ठ क्र. 272)
दुर्ग नगर पालिक निगम भी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुये नगर के विकास हेतु अनिवार्य व ऐच्छिक दोनों तरह के कार्यों को प्राथमिकता के स्तर पर उचित समझते हुये करती है। इन कार्यों को करने हेतु नगर प्रशासन को वित्त की आवश्यकता होती है, चूंकि निगम के पास मूलभूत सुविधा के अलावा और भी बहुत से कार्य हैं करने के लिये, परन्तु वित्तीय संसाधन सीमित ही है। अतः आय-व्यय में उचित सामन्जस्य बनाना किसी भी निकाय के लिये अनिवार्य सा बन जाता है।
प्रस्तावना:
वर्तमान समय में नगरीय प्रशासन का कार्य कठीन हो गया है। नगरीकरण प्रक्रिया में वृद्धि, नगरीय समस्याओं में वृद्धि तथा कार्यों में वृद्धि के कारण नगरीय प्रशासन कार्य चुनौतीपूर्ण हो गया है। इसका विकास क्षेत्र अति व्यापक हो गया है। इसमें नगरीकरण, नगरीय विकास, नगरीय वृद्धि, नगरीय पुर्नविकास, नगरीय आधारित संरचना नगरीय मूलभूत सुविधा की व्यवस्था, नगरीय नियोजन एवं प्रबंध से संबंधित प्रत्येक विचारणीय विषयों का समावेश है, चूंकि स्थानीय संस्थाएं अपने क्षेत्र के नागरिकों को यथासंभव सुविधाएं प्रदान करती है। ये केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा संचालित महत्वपूर्ण योजनाओं का सफल संचालन करती है।
अतः नगरीय निकायों को अपनी सभी मूलभूत कार्यों को करने के लिये पर्याप्त वित्त की आवश्यकता पड़ती है। वित्त जिसे किसी भी प्रशासन का जीवन रक्त कहा जाता है। इसके बिना कोई भी प्रशासनिक नियोजन या निर्णयों का क्रियान्वयन करना असंभव सा बन जाता है। इस प्रकार राजस्व/लोकवित्त के द्वारा ही स्थानीय संस्थाएं अपने कार्यों का निर्वहन करती है। राजस्व या लोकवित्त में जनसंख्या के साधनों को सम्मिलित करते हैं। राजस्व सरकार की वित्तीय पहलू के अध्ययन को कहा जाता हैं। यह सार्वजनिक संस्थाओं जैसे सरकार, स्थानीय संस्थाएं एवं जन निगम के वित्त से संबंध रखता है। राजस्व कीे अवधारणा राज्य और उनसे संबंधित समस्याएं जब सामाजिक कल्याण के लिये धन एकत्रित करती है तथा उसका समुचित उपयोग करती है से संबंधित है।
स्थानीय निकाय नागरिकों के सदैव निकट रहने के कारण इनकी समस्याएं भी अधिक निकट की होती है। अतः इनके द्वारा नागरिकों को अधिकंाशतः प्रत्यक्ष सेवाएं प्रदान करना तथा उनकी कार्य क्षमता को बढ़ाने के प्रयास किये जाते हैं।
स्थानीय निकायों की वित्तीय व्यवस्था के मुख्य स्त्रोतों को निम्न प्रकार से बांटा जा सकता है:-
(1) करो से आय (2) गैरकरगत आय (3) राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान
(1) करो से आय:-
इस मद में सम्पत्तिकर, भूमि भवन कर, सीमाकर, पथकर सम्पत्ति हस्तांतरण पर कर, जलकर, स्वच्छता कर, प्रकाश कर आदि को शामिल किया जाता है।
(2) गैर करगत कार्य:-
इसमें शिक्षा उपकर, दण्ड, किराया, लायसेंस शुल्क आदि शामिल है।
(3) राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान:-
इसमें राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान जैसे सीमा क्षतिपूर्ति शुल्क, वित्त आयोग से प्राप्त राशि, विभिन्न योजनाओं हेतु प्राप्त राशि आदि को सम्मिलित करते है।
इस प्रकार स्थानीय निकाय द्वारा लगाए गये करो को दो भागों में प्रत्यक्षकर व अप्रत्यक्ष कर में भी बांटा जा सकता है। प्रत्यक्ष करों के अंतर्गत सम्पत्ति कर, वृत्तियों या पेशो पर कर, मार्ग शुल्क गाड़ियों पर कर, बाजार कर, जलकर जानवरों के क्रय-विक्रय पर कर आदि सम्मिलित है। प्रत्यक्ष करों के अंतर्गत चुंगी कर, सीमान्त कर, टर्मिनल कर आदि को रखा जा सकता है। निगम को अपनी राजस्व का 68 प्रतिशत भाग करगत स्त्रोतों से ही प्राप्त है। शेष भाग गैर करगत स्त्रोतों से प्राप्त होता है।
अतः अगर दुर्ग, नगर निगम अपनी राजस्व की वसूली ठीक तरीके से करे तो वह अपनी वित्त संबंधी समस्याओं के लिये राज्य सरकार के समक्ष भीख का कटोरा लेकर खड़ा नहीं होना पड़ेगा। राजस्व की शत्प्रतिशत् वसूली करके निगम अपने सभी नागरिकों की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में सक्षम हो सकेगी।
उद्देश्य:-
प्रस्तुत शोध अध्ययन निम्न उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया है:-
1. नगर पालिक निगम, दुर्ग की चालू वर्ष का राजस्व व बकाया राजस्व वसूली का अध्ययन करना।
2. निगम की सम्पत्ति कर वसूली का अध्ययन करना।
शोध प्रविधि:-
इस शोध अध्ययन में प्राथमिक व द्वितीयक समंको का प्रयोग किया गया है। द्वितीयक संमक आय-व्यय पत्रक नगर पालिक निगम, दुर्ग के द्वारा प्राप्त किया गया है। व द्वितीयक समंको का सांख्यिकी विधि द्वारा विश्लेषण कर आंकड़ों को शुद्ध रूप प्रदान किया गया है, चूंकि शोध अध्ययन का उद्देश्य राजस्व वसूली का अध्ययन करना है। अतः प्रतिशत् विधि का ही प्रयोग कर राजस्व वसूली का शुद्ध प्रतिशत् ज्ञात किया गया है। तथा प्राथमिक समंको के संकलन हेतु साक्षात्कार व अनुसूली विधि का प्रयोग किया गया है। जिसके लिये नगर निगम के राजस्व अधिकारी व विभाग से संबंधित कर्मचारियों का सैम्पलिंग के आधार पर साक्षात्कार किया गया है और अन्त में द्वितीयक समंको के सुक्ष्म विश्लेषण के द्वारा ही शोध अध्ययन उद्देश्यों को प्राप्त करने में जोर दिया गया है।
शोध अध्ययन की परिचयात्मक पृष्ठभूमि:-
शोध अध्ययन का क्षेत्र नगर पालिक निगम, दुर्ग है। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ राज्य के मध्य में स्थित है। दुर्ग शहर में 60 वार्ड है। जहां की जनसंख्या 2,68,806 है। कुल जनसंख्या का 51 प्रतिशत पुरूष तथा 49 प्रतिशत महिला है। शहर की साक्षरता दर 72 प्रतिशत है। जिसमें 65 प्रतिशत महिला साक्षरता तथा पुरूष साक्षरता का प्रतिशत 79 प्रतिशत है। दुर्ग शहर शुरू से ही नगरीय निकायों के नवीनतम कार्यों को लेकर चर्चा में रहा है। 1985-1986 में बने मोती काम्पलेक्स का निर्माण व नगर का बहुमुखी विकास की चर्चा सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में होने लगी थी। सफलता का यह परिदृश्य था कि, तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय श्री मोतीलाल वोरा जी मध्यप्रदेश शासन के सचिव द्वारा परिपत्र जारी करके सभी नगरीय निकायों को कहा गया कि वे नगर निगम, दुर्ग के कार्यों का अनुसरण करें। कम दर पर खरीदी, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, बेहतर परिणाम उस समय से नगर निगम की पहचान बन गई थी आज भी नगर पालिक निगम, दुर्ग के क्रियाकलापों का अन्य नगरीय निकायों द्वारा अनुसरण किया जाता है। नगर पालिक निगम, दुर्ग ने क्लीन सिटी प्रतियोगिता में भी अच्छा स्थान प्रदर्शित किया। इसके जीरो वेस्ट प्रोजेक्ट को ’’आर्डर आॅफ मेरिट अवार्ड’’ के लिये चुना गया था अवार्ड के लिये चुने जाने के बाद इस प्रोजेक्ट को देश का सबसे अच्छा प्रोजेक्ट मानते हुये स्काॅच संस्था ने दुर्ग, नगर निगम को ’’प्लेटिनम अवार्ड’’ दिया गया जीरो वेस्ट प्लान की सराहना दिल्ली में भी की गयी।
नगर निगम के दो प्रोजेक्ट को ’’स्काॅच आर्डर आॅफ मेरिट अवार्ड’’ भी मिला है। ये अवार्ड नई दिल्ली में सितम्बर 2017 49वें स्काॅच अवार्ड में बतख पालन और वाटर हार्वेस्टिंग प्रोजेक्ट के लिये दिया गया। ऐनर्जी सेविंग में भी दुर्ग शहर को प्रदेश में प्रथम पुरस्कार क्रेडा द्वारा प्राप्त हुआ सेमिनार में पूरे देश के 100 से अधिक निकाय शामिल थे। इस प्रकार दुर्ग, नगर निगम साॅलिड वेस्ट मेनेजमेंट में सर्वोकृष्ट कार्य के लिये देश भर में सर्वप्रथम ’’प्लेटीनम अवार्ड’’ से सम्मानित किया गया।
परिकल्पनाएं:-
1. निगम की राजस्व वसूली की स्थिति संतोषप्रद है।
2. निगम अपनी चल व बकाया सम्पत्ति कर की वसूली मांग के अनुपात में शत् प्रतिशत् नहीं कर पाता।
उपरोक्त तालिका क्रमांक 01 में राजस्व वसूली चालू वर्ष की मांग और बकाया वर्ष की मांग को प्रदर्शित किया गया है। राजस्व वसूली अंतर्गत सम्पत्ति कर, समेकित कर (जिसमें सफाई, अग्निशमन, प्रकाश कर को कहा जाता है) जलकर, बाजार कर, दुकान किराया व अन्य कर को शामिल किया जाता है। तालिका से स्पष्ट है कि, वर्ष 2014-15 में कुल चल वर्ष के राजस्व मांग का 74.95 प्रतिशत वसूल किया गया और बकाया मांग का (अर्थात् 2014-15 पूर्व के वर्षाें का बकाया राजस्व का) 58.96 प्रतिशत ही वसूल किया गया। इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में कुल मांग का 82.20 प्रतिशत वसूली चालू वर्ष की हुई और बकाया मांग की मात्र 55.46 प्रतिशत वसूली की गई। इसका कारण लोगों की कर वसूली के प्रति जागरूकता की कमी के साथ-साथ वसूली करने वाले कर्मचारियों की लापरवाही भी शामिल है। वर्ष 2016-17 में चालू वर्ष की वसूली जहां 81.00 प्रतिशत रही वहीं बकाया मांग की वसूली में काफी बढ़ोत्तरी देखने को मिली। बकाया मांग का 86.04 प्रतिशत की वसूली की संतोषप्रद स्थिति को प्रदर्शित करती है। वहीं वर्ष 2017-18 में पुनः राजस्व वसूली का आंकड़ा गिरता दिखाई पड़ता है। इस वर्ष चालू वर्ष के मांग की राजस्व वसूली व बकाया मांग की वसूली क्रमांक 68.86 प्रतिशत तथा 65.61 ही रह गया। इस प्रकार इस वर्ष का यह आकड़ा विगत 3 वर्शों की तुलना में कम ही रहा। वर्ष 2017-18 से राजस्व वसूली का कार्य स्पैरोे कम्पनी के माध्यम से आॅनलाईन किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य में दुर्ग नगर पालिक निगम सहित 5 नगरीय निकायों पर स्पैरो कम्पनी को प्रयोग के रूप में आॅनलाईन राजस्व वसूली का कार्य शासन द्वारा दिया गया है। इस प्रकार वर्ष 2017-18 में अन्य वर्षों की तुलना में चालू वर्ष के राजस्व वसूली का प्रतिशत बहुत ही कम रहा। इस वर्ष सम्पत्ति कर की वसूली 69.83 प्रतिशत तथा समेकित कर की वसूली 51.47 प्रतिशत ही देखने को मिली।
इस प्रकार वर्ष 2018-19 में कुल राजस्व वसूली मांग की 80.67 प्रतिशत रही वहीं बकाया राशि की वसूली बहुत ही कम मात्र 38.08 प्रतिशत रही। वसूली पर ये कमी कहीं न कहीं जनता की कर चुकाने के प्रति अरूचि के साथ-साथ निगम प्रशासन के व्यवहार में ढीलेपन को प्रदर्शित करती है।
उपरोक्त तालिका क्रमांक 02 से स्पष्ट है कि, वर्ष 2014-15 में सम्पत्तिकर की मांग 3,65,00,000.00 रूपये की हुई यह कुल मांग को 82.35 प्रतिशत थी। यह आंकड़ा संतोषप्रद प्रतीत होता है हालांकि इस वर्ष बकाया मांग का केवल 60.03 प्रतिशत ही वसूल किया जा सका।
वर्ष 2015-16 में सम्पत्ति कर वसूली में थोड़ी कमी देखने को मिली इस वर्ष चालू वर्ष की मांग का 81.79 प्रतिशत ही वसूल किया जा सका वहीं बकाया मांगों में भी कमी देखने को मिली जो कि 48.30 प्रतिशत रहीं। वहीं वर्ष 2016-17 में चालू वर्ष का सम्पत्ति कर जहां मांग का 79.04 प्रतिशत वसूला गया वहीं बकायां सम्पत्ति कर मांगो में सर्वाधिक वसूली अर्थात 98.51 प्रतिशत की वसूली देखने को मिली। ये वर्ष बकाया मांग की वसूली के हिसाब से अन्य वर्षों की तुलना में बहुत ही अच्छा रहा। वहीं वर्ष 2017-18 में भी चालू वर्ष की सम्पत्ति कर के मांगो का केवल 69.83 प्रतिशत वसूला जा सका वहीं बकाया मांगों का 91.46 प्रतिशत वसूली हुई। इस प्रकार वर्ष 2018-19 में कुल मांग जहां 7,10,00,000.00 रूपये थी वहीं वसूली कुल मांग की 74.56 प्रतिशत अर्थात 5,29,38,000.00 रूपये की देखने को मिली। वहीं इस वर्ष बकाया मांग की राशि में भी कमी देखने को मिली कुल बकाया मांग का केवल 52.79 प्रतिशत अर्थात् 2,15,67,000.00 रूपये ही वसूल किया जा सका।
निष्कर्श:-
नगर पालिक निगम, दुर्ग के राजस्व वसूली के अध्ययन से स्पष्ट है कि वर्ष 2015-16, 2016-17 में चालू वर्ष के राजस्व वसूली 82.20 प्रतिशत तथा 81.00 प्रतिशत रहा है जबकि 2018-19 में बकाया राजस्व वसूली सबसे कम अर्थात 38.08 प्रतिशत ही रहा। निगम प्रशासन को चाहिए की राजस्व वसूली हेतु लोगों को जागरूक करें तथा प्रशासन द्वारा वसूली हेतु समय-समय पर ध्यान दिया जाये। वैसे तो राजस्व वसूली की स्थिति संतोषप्रद है फिर भी निकाय को अपनी राजस्व बढ़ाने के लिये शत् प्रतिशत् वसूली की परिकल्पना को साकार करने की आवश्यकता है तभी निगम को पर्याप्त आय हो सकेगी। इसी प्रकार सम्पत्ति कर विश्लेषण से भी स्पष्ट है कि निगम प्रशासन सम्पत्ति कर की मांग के अनुरूप शत् प्रतिशत् कर वसूली नहीं कर पाता है और लोगों में चालू वर्ष का कर चुकाने में भी कमी देखने को मिली है। जहां वर्ष 2014-15 में ही चल वर्ष की मांग का अधिक अर्थात् 82.35 प्रतिशत सम्पत्ति कर वसूल किया गया वहीं बकाया कर वसूलने में कठोर रवैयों को अपनाने के फलस्वरूप 2016-17 में 98.51 प्रतिशत की कर वसूली सम्भव हो सकी है। इस प्रकार अध्यापित निकाय में राजस्व वसूली की स्थिति संतोषप्रद कही जा सकती है और सम्पत्ति कर की वसूली शत् प्रतिशत नहीं हो पा रही है।
समस्याएं:-
शोध अध्ययन के दौरान कुछ समस्याएं भी देखने को मिली जो कि निगम के सतत् विकास में सर्वदा बाधक ही प्रतीत होती रही है।
1. जनता कर चुकाने के प्रति गंभीर नहीं है। जिससे शत् प्रतिशत कर वसूल कर पाना कठिन सा हो गया है। जनता की ये प्रवृत्ति किसी भी निगम के विकास में बाधक ही है।
2. सम्पत्ति के मूल्यांकन की समस्या अभी भी बनी हुई है। स्वमूल्यांकन की पद्धति से हट कर निगम प्रशासन को कोई विकल्प सोचना चाहिए ताकि लोगों द्वारा सम्पत्ति को कम मूल्य पर नहीं आंका जा सके।
3. निगम द्वारा बनाये गये दुकानों का आबंटन भी शत् प्रतिशत् नहीं हो पाता ये एक गंभीर समस्या है कि, सम्पत्ति को जो बनकर तैयार हो गई है परन्तु उसका आबंटन नहीं होने से उससे किसी प्रकार की आय नहीं मिल पाती।
4. कर वसूली का कार्य स्पैरो कम्पनी को सौंपे जाने से निगम अधिकारी अपने को वसूली कार्य से मुक्त समझते है। उनकी ये प्रवृत्ति निगम के विकास में बाधक है।
5. द्वितीय समंको को सकलन में भी अधिकारियों के मन मे भय व आशंका का भाव देखने को मिला वे राजस्व से संबंधित सूचना देने में ऐ बार में तैयार नहीं थे।
सुझाव:-
नगर पालिक निगम, दुर्ग के संदर्भ में कुछ सुझाव प्रस्तुत किये गये हैं जिनके द्वारा निगम प्रशासन राजस्व वसूली समस्या का निकारण कर अपनी राजस्व वसूली में वृद्धि कर सकता है:-
1. निगम प्रशासन को कर वसूली हेतु मजबूत तंत्र की स्थापना करने के साथ-साथ जनता को भी कर चुकाने हेतु प्रेरित करने का प्रयास करना चाहिये।
2. जनता को कर चुकाने हेतु जागरूक करने के लिये निगम प्रशासन विज्ञापन द्वारा लोगों को जागरूक कर सकता है।
3. निगम प्रशासन को चाहिए कि, वे बकाया कर वसूली हेतु नोटिस अनिवार्य रूप से समय-समय पर देते रहे जरूरत पड़ने पर कुर्की वारंट भी भेजा जाना चाहिये।
4. निगम प्रशासन को अपनी आय बढ़ाने हेतु पुराने व बेकार पड़ी दुकानों गुमटियों को सुधार कर उन्हें पुनः किराये पर उठाना चाहिये।
5. निगम प्रशासन द्वारा दुकानों के आबंटन का कार्य शीघ्र किया जाना चाहिये बोरसी हाट बाजार का निर्माण 2015 से हो चुका है परन्तु अभी तक इन दुकानों का आबंटन नहीं किया गया। इस प्रकार से निगम प्रशासन को सचेत होने की आवश्यकता है।
6. स्पैरो कम्पनी के कार्यों का समय-समय पर मूल्यांकन व अंकेक्षण का कार्य राजस्व अधिकारी द्वारा किया जाना चाहिये।
संदर्भ ग्रन्थ सूची:-
1. राजस्व वसूली का विवरण, नगर पालिक निगम, दुर्ग (2016-17 से 2019-20 तक)
2. श्री राम महेश्वरी, भारत में स्थानीय शासन, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, आगरा
3. डाॅ जे.सी. वैश्णव, राजस्व, साहित्य भवन पब्लिकेशन, आगरा 1977
4. एस.पी.सिंह, लोकवित्त, एस0चन्द्र एण्ड कम्पनी
5. डाॅ रामशरण कौशिक, राजस्व, मिनाक्षी प्रकाशन मेरठ, नई दिल्ली
6. दैनिक भास्कर
7. हरिभूमि
8. ूूूण्बमदेने2011ण्बवण्पदध्बमदेनेध्बपजलध्278.कनतहण्ीजउस
9. ूूूण्उनदपबपचंसबवतचवतंजपवदकनतहण्पद
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Received on 23.04.2019 Modified on 11.05.2019
Accepted on 27.05.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):531-536.